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हठयोग में आसन (Hathyog ke Aasan)

हठयोग कहता है कि स्वस्थ शरीर, आत्मा को स्वस्थ करके ईश्वर से जोड़ता है। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है। अतः इसे स्वस्थ व मजबूत रखना हमारा कर्त्तव्य है। हठयोग का मुख्य उद्देश्य भी यही है।

‘हठयोग‘ बिना ‘आसन‘ अभ्यास के असम्भव है। सैंकड़ो प्रकार के जो आसन हैं, वे विशेषतः ‘हठयोग‘ के अभ्यास के लिए सहायक हैं। योगासन से शरीर स्वस्थ और मजबूत बनता है तथा आयु भी लम्बी होती है, इसमें दो राय नहीं है।

(इस लेख में हम जानेंगे - Different Aasans of Hathyoga, in Hindi)

Table of Contents (in Hindi)
  • आसन क्या होता है ?
  • आसन करते समय ध्यान देने योग्य बातें
  • आसन सम्बंधित कुछ चेतावनियाँ तथा सावधानियाँ
  • कुछ महत्वपूर्ण हठयोग आसन

आसन क्या होता है ? (aasan kya hota hai?)

आसन की परिभाषा महर्षि पतंजलि ने अपने सूत्रों में - ‘तत्रास्थिर सुभमासनम्‘ कहकर की है, जिसका अर्थ है कि जिसमें सुखपूर्वक शरीर और आत्मा स्थिर हो, उसको आसन कहते हैं।

परन्तु ‘योगासन‘ जिस ढंग औरा प्रकार से किये जाते है, उनमें शरीर सुखपूर्वक तो रह नहीं सकता। पतंजलि योगसूत्रों में आसनों के ये जटिल ढंग नहीं है| वो इसलिए, क्योंकि पतंजलि का योगदर्शन सांख्यमत पर आधारित है और वह राजयोग विद्या है। पर हठयोग में कई जटिल आसन भी शामिल किये गए हैं, जो करते हुए कष्टदायक तो लगते हैं, पर शरीर के लिए बहुत लाभदायक होते हैं|

योग के प्रारम्भिक अंग - ‘यम‘ और ‘नियम‘ का प्रत्येक समय, चलते-फिरते भी अनुष्ठान किया जा सकता है। किन्तु आसन के लिए तो एक ही स्थान पर, समय देकर करना आवश्यक है।

प्रारम्भिक अंग ‘यम‘, ‘नियम‘ पर हठयोगी अलग से जोर भी नहीं देते हैं। हठयोग की विशेष क्रियाएँ ‘षटकर्म‘ आसन तथा प्राणायाम हैं। बिना इनके हठयोग में सिद्ध होना संभव नहीं है।

इनमें भी ‘आसन‘ हठयोग में विशेष महत्त्व रखते हैं। सामान्यजन भी, जो योग साधनाओं में अधिक समय नहीं दे सकते, अपने दैनिक कार्य व्यवहारों को करते हुए भी आसनों द्वारा शरीर को निरोग, सुन्दर, स्वस्थ और दीर्घायु बना सकते हैं।

आसन करते समय ध्यान देने योग्य बातें

कोई भी आसन करते समय निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए:

  • आसन अभ्यास प्रातःकाल में करना सर्वोत्तम है। समय मिल सके तो शाम को भी करें।
  • पेट खाली और साफ होना चाहिए।
  • जिस स्थान पर आसन-प्राणायाम करें, वह साफ, शुद्ध, दुर्गन्ध और धूल-धुएँ से रहित होना चाहिए। वहाँ शोर भी नहीं होना चाहिए।
  • शरीर पर लंगोट अवश्य हो। अन्य वस्त्र न हो तो अच्छा है। सर्दियों में अन्डरवियर-बनियान भी ऊपर से पहन सकते हैं।
  • अभ्यास निरन्तर करें। नित्य, सही समय पर। बीच में अभ्यास छोड़ना अनुचित है।
  • जल्दबाजी न करें। किसी शिक्षक से सीख लें या खूब समझ लें।
  • आसनों में यह भी ध्यान रहे कि, जिस ओर आसन किया है उससे दूसरी ओर का भी अवश्य करें। जैसे आपने सर्वांग आसन किया है तो इसका उल्टा भुजंगासन (सर्पासन) आदि भी करें।
  • समतल भूमि पर कम्बल, दरी या मृगछाला बिछाकर आसन करें। कोई अन्य कपड़ा भी बिछा सकते हैं। सिर या नाभि स्थान पर शरीर का वनज जिन आसनों में रहता है, उनमें कपड़े की गद्दी सिर या नाभि के नीचे अवश्य रख लें।
  • हठयोग करते हुए, ब्रह्मचर्य और सात्विक आहार विशेष रूप से लाभकारी हैं।
आसन सम्बंधित कुछ चेतावनियाँ तथा सावधानियाँ
  • कठिन रोगों और बुखार की दशा में आसन न करें।

  • जिनकी हड्डी-टूटने पर जोड़ी गई है, वे ध्यान रखें कि उस अंग का आसन न करें। हड्डी पर जोर नहीं पड़ना चाहिए, पुनः टूटने का भय रहता है।

  • गर्भवती स्त्रियाँ आसनों का अभ्यास न करें। वे कोई अत्यन्त हल्का व्यायाम कर लें।

  • बालक और वृ़द्ध कठिन आसनों के स्थान पर सरल करें। दस-बारह वर्ष से कम वाले बालकों से आसन न करायें।

  • युवा लोग कठिन आसनों को प्रारंभ में न करें। जब अभ्यास होने लगे तब करें।

कुछ महत्वपूर्ण हठयोग आसन (kuch hathyog aasan)

यहाँ कुछ योगासनों को लिखना हम उचित समझते हैं।

वज्रासन (vajrasan)

जमीन पर घुटने टिकाकर, पांव पीछे करके, नितम्ब पैरों के तलुओं पर टिकाकर बैठ जायें। दोनों हाथों को कोहनियों को बिना मोड़े, हथेलियों को जमीन की ओर करके घुटनों पर रखें। दृष्टि सामने स्थिर रखें।

वज्रासन के लाभ

इस आसन से आयु बढ़ती है, नेत्र ज्योति बढ़ती है, वीर्य शक्ति ऊध्र्वगामी होती है, शरीर वज्र जैसा बनता है। शरीर निरोग और सुन्दर रहता है। मन का संयम सरल हो जाता है।

पद्मासन (padmasan)

इसे करने के लिए सर्वप्रथम भूमि पर बैठें, टांगे सीधी करें, दोनों पांवों को मिलाकर रखें। फिर दाहिना पैर बाई और बायां दाई जंघा पर इस प्रकार रखें कि दोनों पैरों की एड़ियाँ नाभि के दोनों ओर पेट से सटी हुई हों। हाथों को घुटनों पर रखें। दोनों पांवों के घुटने जमीन से मिले रहने चाहिएं। दृष्टि बन्द रख सकते हैं। इस आसन को करते समय ‘प्राणायाम‘ विधि पूर्वक करें।

पद्मासन के लाभ

इस आसन से बहुत लाभ हैं। ब्रह्मचारी के लिए तो बहुत ही उत्तम है। इससे चंचल मन वश में होता है, आयु बढ़ती है, वीर्य रुकता है, कफ-वात-पित्त, त्रिदोष दूर होते हैं। सुख शांति बढ़ती है। मानसिक कार्य करने वालों के लिए परम उपयोगी है। स्त्रियाँ भी कर सकती हैं।

ताड़ासन (tadasan)

इस आसन में चूँकि मनुष्य ताड़ के वृक्ष की भांति सीधा खड़ा होता है इसलिए इसे ताड़ासन कहा गया है।

इसे करने के लिए पहले सीधे खड़े हो जायें। दोनों पैरों को आपस में मिला लें। फिर भुजाओं को कंधो की सीध में फैलायें, तत्पश्चात् आकाश की ओर उठाते चले जायें। ऊपर उठाये रहें।

सांस खींचकर अन्दर भर लें। एड़ियों को उठाकर पंजों बल खड़े रहें। शरीर को ऊपर इस प्रकार खींचे जैसे आप आकाश को छूने का प्रयास कर रहे हों।

तद्पश्चात पांव और हाथों को नीचे लाकर सांस बाहर निकालें।

ताड़ासन के लाभ

इस आसन से भुजाओं, टांगों, सीने और कमर को शक्ति मिलती है। फुर्ती आती है। शरीर की लम्बाई में वृद्धि होती है। छोटे कद वालों को यह आसन अवश्य करना चाहिए। दिल मजबूत होता है तथा हाजमा भी सही रहता है। स्त्रियाँ भी करें।

सर्वांग आसन (sarwang aasan)

यह शरीर के समस्त अंगों का आसन है। इसमें सारे अंग क्रियाशील होते हैं।

जमीन पर चित्त लेटकर दोनों पैर तथा सारा शरीर बिल्कुल सीधा रखे। सांस निकालकर धीरे-धीरे पैरों को सीधा रखते हुए ऊपर उठावें। प्रथम कमर तक पैर उठावें फिर पीठ का जो भाग जमीन पर हो उसे उठाकर दोनों हाथों से कमर को पकड़कर, कंधो से पैरों तक सारे शरीर को सीधा रखें। अभ्यास हो जाने पर हाथों का सहारा भी छोड़ सकते हैं। हाथों को जमीन पर सीधा रख लें। पैर सीधे आकाश की ओर रहें। शीर्षासन की भांति। सिर और कंधे जमीन पर टिके रहें। दृष्टि दोनों पांवों पर टिकी रहें।

नोट

यह आसन सिद्ध हो जाने पर आप ऊपर ही ‘पद्मासन‘ लगा सकते। उसे ‘ऊध्र्व पद्मासन‘ कहते हैं। एक टांग के घुटने को मोड़कर कान से लगाने पर ‘कर्णपीडलोध्र्व सर्वांग आसन‘ होता है। ऊपर उठाई टांगों को आगे तथा पीछे की ओर सीधा जमीन पर लगाने से ‘हेलोध्र्व सर्वांगासन‘ होता है।

सर्वांग आसन के लाभ

‘हठयोग‘ के शास्त्रकारों ने इस आसन की बड़ी प्रशंसा लिखी है। ‘हठयोग‘ के सिद्ध योगियों और शास्त्रकारों ने लिखा है कि इस आसन से शरीर को बूढ़ा होने से रोकने वाले ‘रस‘ शरीर में सक्रिय होते हैं। पेट की पाचन क्रिया तेज होती है, बुढ़ापा आकर खाल नहीं लकटती, बाल सफेद नहीं होते, बल-बुद्धि बढ़ते हैं, वीर्य रक्षा होती है, जिगर रोग दूर होते हैं, स्मरणशक्ति बढ़ती है। चेहरा साफ, तजेस्वी बनता है, कब्ज, अजीर्ण, अपच, नया-नया अपेण्डीसाईटिस, अंगों का विकार, चर्म रोग, रक्त दोष, स्त्रियों की मासिकधर्म में पीड़ा, अनियमितता, सिर दर्द आदि रोग दूर हो जाते हैं। सिर तथा नेत्र के रोगों के लिए तो यह बहुत अच्छा आसन है। स्त्रियाँ भी करें।

शीर्षासन / विपरीत-करणी (seershasan)

शीर्षासन आसनों में श्रेष्ठ है। चूंकि इसमें शरीर की मुद्रा उल्टी हाती है इसलिए इसे ‘विपरीत-करणी‘ मुद्रा भी कहा गया है। कुछ लोग ‘कपालासन‘ या ‘वृक्षासन‘ भी कहते हैं।

इस आसन को करने के लिए, पहले आप अपने सामने कपड़े की गद्दी-सी बनाकर रख लें फिर घुटनों के बल बैठकर आगे की ओर झुकते हुए, हाथ की अंगुलियाँ एक दूसरी में डालते हुए, कपड़े की गद्दी के साथ ही गोलाई में रखें और सिर को गद्दी पर इस प्रकार टिका दें कि कुछ भाग गद्दी तथा कुछ हथेलियों पर रहे। इससे सिर पर दबाव कम रहेगा। पैरों को उठाते हुए सीधे आकाश की ओर उठा लें। पैरों का संभालते हुए धीरे-धीरे समय बढ़ाते चले जायें।

शीर्षासन की स्थिति में दृष्टि को कुछ समय सामने की ओर तथा कुछ समय मस्तक के निकट रख सकते हैं। श्वांस-प्रश्वांस पर विशेष ध्यान दें। गहरे और सन्तुलित सांस लें। जितने समय में सांस लें, उतने में ही छोड़े। आसन सिद्ध होने पर कुम्भक कर सकते हैं। चित्त को शांत रखें। शरीर को स्थिर रखें। हिले-डुले नहीं।

प्रारम्भ में यह आसन किसी गुरु की सहायता से सीखें तो अच्छा है। गुरु न मिले और न कोई साथी हो, तो दीवार का सहारा लें। किन्तु सदैव नहीं।

शीर्षासन के बाद जितनी देर आसन किया है उतनी ही देर तक सीधे खड़े रहें। क्यूंकि इसमें रक्त उल्टा दौड़ता है। उसे पुनः उसी दिशा में चलाने के लिए उतनी ही देर शान्त खड़े रहें।

चेतावनी

सर्व प्रथम पेट साफ कर लेना चाहिए। भरे पेट या पेट में अन्य विकारों के होते शीर्षासन करना उचित नहीं है। ‘शीर्षासन‘ गर्भवतियों को छोड़कर, अन्य सभी स्त्रियाँ कर सकती हैं।

शीर्षासन के लाभ

शीर्षासन से अनेक लाभ ‘हठयोग‘ प्रदीपिका‘ आदि ग्रन्थों में गिनाये गए हैं।

पाचनक्रिया तेज और दुरुस्त होती है। अनेक रोग दूर होते हैं, नेत्र-ज्योति बढ़ती है, ऊर्जा शक्ति का प्रवाह मस्तिष्क की ओर होने से वीर्य रक्षा होती है - ब्रह्मचर्य पालन में सरलता रहती है, वायु रोगों में लाभ मिलता है, शरीर तेजस्वी बनता है, वृद्धावस्था जल्दी नहीं आती और आयु लम्बी होती है।

इनके अतिरिक्त अन्य भी बहुत लाभ हैं - जैसे सिर में चक्कर नहीं आते, पागलपन और मूर्छा में लाभ होता है। नींद अच्छी आती है, याददाश्त बढ़ती है, हारनियां जैसे रोग नहीं सताते, दिल मजबूत होता है, नर्वस सिस्टम ठीक होता है, चर्म रोग नहीं होते, शारीरिक और मानसिक शक्ति मिलती है। यह आसन शरीर का कायाकल्प ही कर देता है। सुख और शक्तिदायक है। मृत्यु भी ऐसे योगी से दूर रहती है।

नोट

‘शीर्षासन‘ की ही स्थिति में ऊध्र्व पद्मासन, पद्म शिरनाभि स्पर्शासन आदि किये जा सकते हैं। इनमें ऊपर ही ऊपर पद्मासन लगाते हैं। अर्थात् पांवों को मोड़कर ऐसी पालथी लगाते हैं कि पांव एक-दूसरे में फंस जाते हैं। इनमें वे ही लाभ हैं जो शीर्षासन में हैं। पांवों के लिए कुछ लाभ और बढ़ जाते हैं। परन्तु ये स्त्रियों के लिए नहीं हैं।

सिद्धासन (siddhasan)

यह आसन भी ‘शीर्षासन‘ की भांति श्रेष्ठ आसन माना जाता है। इसे करने के लिए भूमि पर सीधे बैठकर बायें पैर की एड़ी को अंडकोष और गुदा के मध्य भाग में दबाकर लगावें। दायें पैर की एड़ी की सीध में रखें। सारा शरीर सीधा रहना चाहिए। हाथ घुटनों पर रख लें। आँखें बंद करके अपने शरीर के भीतर कहीं ध्यान एकाग्र करें। भूमध्य, मस्तक, मस्तिष्क के भीतर या कुण्डलिनी में ध्यान कर सकते हैं। आसन सिद्ध होने पर प्राणायाम कर सकते हैं।

इस आसन को करते समय ‘अपान‘ को ऊपर खींचने का अभ्यास करें। गुदा, इन्द्रिय, पेट सभी को ऊपर की ओर खींचें। आसन को शान्त, स्वच्छ, एकान्त स्थान में करने पर अधिक लाभ है।

सिद्धासन के लाभ

इस आसन का विधिपूर्वक अभ्यास करने से मन को एकाग्र करने में सरलता रहती है। विचारों में पवित्रता आती है। वीर्य रक्षा होती है और वह ऊध्र्वगामी होता है। वीर्य सम्बन्धी रोगों में लाभकारी है। कुण्डलिनी जागृत करने, ‘औज‘ व मेधा शक्ति को प्राणायाम द्वारा मस्तिष्क में ले जाकर ‘दिव्य ज्ञान‘ और ऊर्जा शक्ति की प्राप्ति के इच्छुक इसी आसन का अभ्यास करें। स्मरणशक्ति बढ़ाने और मस्तिष्क को तीव्र करने के लिए भी यह श्रेष्ठ आसन है। इससे पेट के रोग भी दूर होकर पाचन शक्ति बढ़ती है।

महावीरासन (mahavirasan)

यह नाम इस आसन का महावीर हनुमान के नाम पर रखा गया है। इसमें शरीर की दशा महावीर बजरंगबली हनुमान की सी हो जाती है।

इस आसन को करने के लिए, सीधे खड़े होकर पूरक करके श्वांस लें, उसके बाद कुम्भक कायम रखते हुए कोई से एक पैर को लगभग एक गज या तीन फुट आगे बढ़ायें। दोनों हाथों की मुट्ठियाँ बंद करके ऊपर उठावें- क्रमशः पैरों को बदलते रहें। थक जाने पर रुककर रेचक और उसके बाद पूरक क्रमशः करें। धीरे-धीरे पैर आगे-पीछे ले जाने की गति को तेज करना चाहिए।

महावीरासन के लाभ

इस आसन से छाती का विकास होता है। हाथ-पांव मजबूत होते हैं। पेट हल्का रहता है। कद बढ़ता है। शरीर मजबूत और तेजस्वी बनता है। स्त्रियों के लिए भी उपयोगी है।

उत्कटासन (utkatasan)

इसे ‘कुर्सी आसन‘ भी कहते हैं। इसमें शरीर की स्थिति ऐसी होती है जैसे कुर्सी पर बैठते हैं।

भूमि पर सीधे खड़े हो जाएं। पैरों में एक फुट का अन्तर रखें। दोनों हाथ कमर पर रखकर, श्वांस खींचकर धीरे-धीरे झुककर ऐसे हों जैसे कुर्सी पर बैठ रहे हों। सारा वनज टांगों के घुटनों के नीचे पावों तक आना चाहिए। सुविधा अनुसार इस स्थिाित में रहकर ऊपर उठे और रेचक करके श्वांस को निकालें। तब तक कुर्सी की अवस्था में ‘कुम्भक‘ किये रहें।

भलीभांति अभ्यास हो जाने पर कुर्सी की स्थिति से भी नीचे शरीर को ले जावें। पैरों के पंजों पर सारे शरीर का वनज आवे। नितम्ब पैर की एड़ी की सीध में रखें। यह आकार ठीक उसी प्रकार का बनाना है जैसे कोई व्यक्ति शौच के लिए बैठा हो। इसमें शरीर का वजन पैर के पंजों पर रहता है। पैरों की एड़ियाँ उठी हुई होती हैं।

उत्कटासन के लाभ

इससे टांगे मजबूत बनती हैं। पांव में सूजन रोग नहीं होता। वायु का नाश होता है। घुटनों का दर्द नहीं सताता। स्त्रियों के लिए भी उपयोगी है।

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