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प्राणायाम के प्रकार और विधियाँ (pranayam ke prakar)

सांख्य दर्शन के मत पर आधारित योग दर्शन को ‘राजयोग विद्या‘ कह सकते हैं। पतंजलि का योगदर्शन है ही राजयोग।

प्राणायाम राजयोग का बहुत महत्वपूर्ण हिस्सा है| साथ ही, ‘प्राणायाम‘ जिस प्रकार राजयोग में आवश्यक है उसी प्रकार हठयोग में भी।

(इस लेख में हम जानेंगे - types of Pranayam, in Hindi)

Table of Contents (in Hindi)
  • प्राणायाम के प्रकार
  • कुछ महत्वपूर्ण प्राणायाम विधियाँ
  • कुण्डलिनी जागरण में सहायक प्राणायाम

प्राणायाम के प्रकार (pranayam ke prakar)

प्राणायाम के अनेक प्रकार या भेद योगाचार्यों और योग दर्शनकारों ने दिए हैं। इसमें पतंजलि ने चार प्रकार के प्राणायाम बतायें हैं। ये हैं:

  • बाह्य वृत्ति या रेचक - श्वांस छोड़ना
  • आभ्यन्तर वृत्ति या पूरक - श्वांस लेना
  • स्तम्भवृत्ति या कुम्भक - यह श्वांस को बाहर निकलने से, या भीतर जाने से रोकने वाला प्राणायाम है।
  • बाह्यभ्यन्तराक्षेपी

इन्ही चारों को विभिन्न प्रकार से मिला-जुलाकर भाँति-भाँति की प्राणायाम विधियाँ विकसित की गयी हैं| इससे पहले हम प्राणायाम की विभिन्न विधियाँ को जानें, आईये पहले प्राणायाम के इन चार प्रकारों को विस्तार से समझ लेते हैं|

बाह्य वृत्ति या रेचक (rechak)

प्राणायाम में ‘रेचक‘ का अर्थ है श्वांस छोड़ना। इसे संयमति करना। अर्थार्थ सांस को बाहर निकालना बाह्यवृत्ति (रेचक) है। बाह्य वृत्ति छोड़ने को ही कहते हैं।

आभ्यन्तर वृत्ति या पूरक (poorak)

जैसे बाह्य वृत्ति में बाहर निकाला था, ऐसे ही श्वांस को भीतर ले जाने को पूरक कहते हैं।

ज्यादातर प्राणायाम क्रियाओं में रेचक और पूरक दोनों किये जाते हैं - कभी तेजी से कभी धीरे-धीरे| श्वांस की गति को धीरे करके या बढाकर अपनी प्राण शक्ति पर आधिपत्य कायम करना योग का एक लक्ष्य होता है (चाहे आप राजयोग कर रहे हों, या कुंडलिनी योग इत्यादि)|

योगी कई सांसों को मिलाकर एक करते हैं। जैसे एक मिनट में आप आठ बार सांस लेते हैं और इतनी बार ही छोड़ते हैं। इन्हें कम करते हुए एक में ले आना। अर्थात् एक मिनट में एक बार सांस लेना और एक ही बार छोड़ना।

स्तम्भवृत्ति (kumbhak)

स्वाभाविक रूप से चलते सांस को जहाँ का तहाँ रोक देना स्तम्भवृत्ति कहलाता है। इसे कुम्भक भी कहते हैं।

बाह्यभ्यन्तराक्षेपी

यह दो प्रकार से होता है। इसमें रेचक, पूरक और कुम्भक प्राणायामों, तीनो को ही किया जाता है। इन्हें देश, काल और संख्या के आधार पर नियमित करते हैं।

बाह्याक्षेपी में मूलाधार से नाभि तक वायु को निकाल कर बाह्य कुम्भक द्वारा रोकें, घबराहट हो तो फिर नाभि से हृदय तक निकाल कर वहीं रोकें। जब घबराहट हो तो हृदय से कंठ तक की वायु को भी बाहर ही निकाल कर रोक दें और यथाशक्ति रोके रखने का प्रयास करें| यह बाह्य कुम्भक हुआ।

आभ्यन्तराक्षेपी तब होता है जब बाहर की वायु को विशेष गति से इस प्रकार भीतर खींचे कि मूलाधार से नाभि तक का स्थान भर जाये, यथा शक्ति रोकने के बाद नाभि से हृदय तक, फिर रोकने के बाद हृदय से कंठ तक भर लें और यथा शक्ति रोके रखने का प्रयास करें| यह आभ्यन्तर कुम्भक हुआ।

नोट
  • देश का अर्थ है स्थान, जैसे मूलाधार से नाभि, नाभि से हृदय, हृदय से कंठ।

  • काल का अर्थ है समय। जैसे दस सैकेण्ड का रेचक, पाँच सैकेण्ड का कुम्भक या दस सैकेण्ड का पूरक आदि।

  • संख्या का अर्थ है छः मात्रा या गिनती तक पूरक, तीन मात्रा तक कुम्भक और छः मात्रा तक रेचक करना आदि।

  • दीर्घ-सूूक्ष्म भी योगदर्शन में आया है। उसका अर्थ है - श्वांस लम्बा है या छोटा, गहरा है या हल्का| यानी बाहर को आप जो सांस छोड़ रहे हैं वह कितनी दूर तक प्रभावी है। मान लीजिये आपके सामने एक फीट की दूरी पर रखा कोई कागज, बाल, रुई या दीपक की लौ रेचक से हिलती है, फिर आप उसे और दूर सरका देते हैं, दो फीट तक, फिर तीन फीट तक और फिर भी आपकी सांस का असर वहां तक होता है, तो यह सूक्ष्म से दीर्घ हो गया। इसी प्रकार अन्दर की ओर सांस कंठ तक जाना, हृदय या मूला-घार तक जाना सूक्ष्म से दीर्घ होता है।

कुछ महत्वपूर्ण प्राणायाम विधियाँ (kuch mahatwapoorna pranayam)

अब तक हमने प्राणायाम के मूल सिद्धांतों को समझा| अब आईये कुछ प्राणायाम विधियों के बारे में भी जान लेते हैं - जैसे की सहित कुम्भक, सूर्य भेदी, उज्जायी, शीतली, मस्त्रिका, भ्रामरी, मूर्छा, केवली इत्यादि|

सहित कुम्भक प्राणायाम (sahit kumbhak pranayam)

सहित कुम्भक दो प्रकार का होता है - सगर्भ और निगर्भ। सगर्भ वह है जो किसी मंत्रादि के साथ किया जाता है और निगर्भ वह जो बिना मंत्रों या गिनतियों के करते हैं।

सहित कुम्भक को करने की विधि के भी कई प्रकार होते हैं - जैसे कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम। इनमें अंतर बस रेचक, पूरक और कुम्भक की अवधि का होता है|

आईये कनिष्ठ सहित कुम्भक की विधि को जान लें:

  • पूरक - कनिष्ठ सहित कुम्भक में हम सीधे बैठकर पहले दाएं हाथ के अंगूठे से नासिका के दाएं छिद्र को बंद करते हैं| फिर बाएं नथुने से पूरक करते हैं, यानी साँस अंदर लेते हैं।
  • कुम्भक - जितना समय पूरक में लगाया, उसके चार गुना समय तक कुम्भक करते हैं| समय का भान रखने के लिए आप गिनती कर सकते हैं, या ओमकार मंत्र का जाप कर सकते हैं|
  • रेचक - उसके पश्चात् हम पूरक के दुगने समय तक अनामिका अंगुली और माध्यमा अंगुली मिलाकर बायां नथूना बंद कर दाहिने नथुने से रेचक करते हैं, अर्थार्थ साँस बाहर निकालते हैं|

इसी प्रकार दूसरे नासा छिद्र से कर सकते हैं। यह कनिष्ठ अभ्यास हुआ।

सहित कुम्भक के लाभ

  • इस प्रणायाम से मन प्रफुल्लित, शरीर चुस्त और शक्तिशाली, तथा चेहरा सुन्दर हो जाता है।
  • इन्द्रियाँ और मन वश में आने लगते हैं, द्वन्द्वों और भूख प्यास पर अधिकार होने लगता है।

अनुलोम विलोम प्राणायाम (anulom-vilom pranayam)

पद्मासन में बैठकर दायें नथुने को अंगूठे से बन्द करके बायें से प्राण वायु को मूलाधार तक खूब भीतर भर लें और फिर बिना कुम्भक किये बायें को बन्द कर दाहिने से धीरे-धीरे रेचक करें। अब इसी दाहिने से वायु भरें और बायें से छोड़ें। इसमें जिस नथुने से सांस छोड़ते हैं, उसी नथुने से पूरक करते हैं। कुम्भक बिल्कुल नहीं करते हैं।

अनुलोम विलोम प्राणायाम के लाभ

  • नाड़ियों और नसों की शुद्धि तथा देह में रक्त संचार को सुचारू एवं नियमित करने के लिए यह प्राणायाम अत्यन्त लाभप्रद है। मन चाहे नथुने से योगी सांस ले सकता है।

  • इस प्राणायाम से ध्यान की स्थिरता, सूक्ष्मता और दीर्घता आती है।

सूर्य भेदी प्राणायाम (surya-bhedi pranayam)

अपने सिद्ध किये आसन में बैठकर नाक के दाहिने नथुने से (जिसे सूर्यनाड़ी कहते है), धीरे-धीरे गहरी श्वांस से पूरक करें। फिर यथाशक्ति कुम्भक करके इसके बाद चन्द्रनाड़ी अर्थात बांये नथुने से श्वांस को वेगपूर्वक बाहर निकालें अर्थात रेचक करें।

प्रथम दिन तीन बार इस प्रणायाम को शुरू करें और फिर सामर्थ्यानुसार बढ़ाते जाएं।

सूर्य भेदी प्राणायाम के लाभ

  • यह नाड़ी शुद्ध करता है।
  • सूर्य भेदी प्राणायाम से शरीर मे गर्मी आती है।
  • पित्त बढ़ता है, कफ और वात नष्ट होता है।
  • यह पाचन क्रिया को तेज करता है।
  • शरीर को बल और तेज प्रदान करके बुढ़ापे और मृत्यु को शीघ्र नहीं आने देता।

उज्जायी प्राणायाम (ujjayayi pranayam)

पहले बलपूर्वक पूर्ण रेचक करके श्वांस को दोनों नासपुटों से अन्दर खींचे और बिना कुम्भक किये धीरे-धीरे बाहर निकाल दें। इसमें सांस पूर्णरूपेण पूरक की जाती है, छाती पूरी तरह फूल जाती है।

विधि यह है कि दोनों नासपुटों से कंठ से हृदय तक खूब हवा भर लें फिर छाती को पूरी फुलाकर, हृदय से नीचे वायु न जाने देकर, धीरे-धीरे रेचक कर दें।

कुछ योगाचार्य इसमें भी कुम्भक का उल्लेख करते हैं। उनके अनुसार कुम्भक करने के बाद ही धीरे-धीरे रेचक करते हैं।

उज्जायी प्राणायाम के लाभ

उज्जायी से भी कई लाभ हैं।

  • नाड़ियों का अवरोध दूर करता है।
  • यह कंठ के बलगम, वीर्य दोष, खांसी, वात रोग, तिल्ली के रोग दूर करता है।

भ्रामरी प्राणायाम (bhramari pranayam)

वीरासन, पद्मासन या सिद्धासन में बैठकर अंगूठे से दायें नथुने को दबाकर बायें से पूरक करें। जब मूलाधर तक प्राणवायु भली प्रकार से भर जाये, तब कुछ देर कुम्भक करके कंठ से भवरें जैसी गुंजन उत्पन्न करते हुए दाहिने नथुने से धीरे-धीरे रेचक करते रहें। रेचक को लम्बा करते हुए मन और बुद्धि को इस भ्रमर गुंजन में लगाये। यथा शक्ति रेचक को दीर्घ किया जाये और गुंजन में ऊं नाम में ध्यान भी निगमन किया जाये।

भ्रामरी प्राणायाम के लाभ

इस प्रणायाम से मन और वाणी में पवित्रता और तन्मयता आती है, तथा समाधि लाभ हो सकता है।

मूर्छा प्राणायाम (moorcha pranayam)

पदमासन में बैठकर दायें हाथ के अंगूठें से दायें नथुने दबाकर बायें नथुनें से श्वांस भरकर कुम्भक कर लें। जालन्धर बन्ध लगाकर मानसिक सोचों का अभाव करके मूर्छित से होने का प्रयास करें। दृष्टि भवों में मध्य में रखे। जब कुम्भक न रखा जा सके तो दोनों नासपुटों से धीरे-धीरे प्राण का रेचन कर दें। कुम्भक के समय मन को विलीन-सा करने का प्रयत्न करते हैं। इससे मन शान्त होकर मूर्छित सा हो जाता है।

इसी प्रकार नथुने को बदल कर फिर से ऐसा करें। अभ्यास को बढ़ाते जायें।

इसके अभ्यास से मन शान्त हो जाता है।

केवली प्राणायाम (kevali pranayam)

स्वस्तिक आसन में बैठकर रेचक-पूरक किये बिना ही प्राण को जहां का तहां सहसा रोकना, केवली कुम्भक प्राणायाम है।

यह वास्तव में राजयोग का ‘स्तम्भवृत्ति’ प्राणायाम ही है। इनमें कोई भेद नहीं लगता।

इस प्रणायाम से द्वन्द्वों का नाश, आयु की वृद्धि, ध्यान में दृढ़ता और दिव्य दृष्टि की उपलब्धि होती है।

सीत्कारी प्राणायाम (sitkari pranayam)

सिद्धासन पर बैठकर, चोंच के समान बनी जीभ को मुख से बाहर निकालकर ‘सीत्कार’ (सी-सी ……. ऽ ऽ ऽ) शब्द निकालते हुए पूरक करके, बिना कुम्भक किये तत्काल दोनों नथुनों से तेजी से रेचक करें। इसी प्रकार बार-बार जीभ के द्वारा पूरक और नासिका द्वारा रेचन करें।

मुख के द्वारा जीभ से सीतकार करते हुए पूरक तथा नासिका से रेचक करते रहने से सौंदर्य वृद्धि होती है। पित्त प्रकृति वाले इसे सदा कर सकते हैं। यह ग्रीष्म ऋतु में लाभकारी है।

प्लावनी प्राणायाम (plavani pranayam)

किसी स्थिर आसन में बैठकर दोनों नथुनों से पूरक करके इतना प्राण वायु भरे ले कि आपका पेट बहुत फुल जाये। मानो पेट में ही सारे शरीर की हवा भर गई हो। यशाशक्ति कुम्भक करने के पश्चात् दोनों नासपुटों से धीरे-धीरे रेचक करें। इसी क्रम को इच्छानुसार दोहरायें।

इससे पेट की अग्नि प्रदीप्त होकर पाचन क्रिया तेज होती है, कब्ज दूर होता है, अपान प्राण को शुद्ध करता है। अधिक अभ्यास होने पर व्यक्ति जल पर बिना हाथ-पांव हिलाए तैर सकता है।

भस्त्रिका प्राणायाम (bhastrika pranayam)

अभ्यस्त आसन में बैठकर दाएं हाथ की माध्यमा और अनामिका अंगुलियों को जोड़कर सीधा रखें, शेष को मोड़ लें। इन अँगुलियों से बायें नथुने को बन्द कर लें और कोहनी को मरोड़ कर कंधे के समान ऊंचा उठा लें| बायें हाथ को दाएं घुटने पर रख लें। अब बिना कुम्भक किये दाएं नथुने से शब्द उत्पन्न करते हुए बलपूर्वक रेचक-पूरक को बिना रुके लम्बे-लम्बे श्वांस-प्रश्वांस द्वारा करें। श्वांस-प्रश्वांस की टक्कर अंगुलियों पर जोर से बल-पूर्वक लगती रहे। कम से कम आठ दस बार पूरक-रेचक करें। इसके बाद साँस अन्दर ही रोक लें। यवाशक्ति कुम्भक के बाद बायें नासपुट से रेचक करें। रेचक करते समय अंगूठे से दायें नथुने को दबा लें।

इसी प्रकार फिर दायें नथुनें को बन्द करके दूसरी ओर से करें।

प्रारम्भ में दोनों ओर से तीन-तीन प्राणयोग करें, फिर नित्यप्रति बढ़ाते जायें। कुछ योगी इसमें कुम्भक के समय जालंधर बन्ध भी लगाते हैं।

इससे कुण्डलिनी जागरण हो सकता है। यह कफ को सुखाता है। मोटी देह को पतली करता है।

सावधानी
  • कमजोर को यह प्राणायाम अधिक वेग और शक्ति से नहीं करना चाहिए।

  • इस प्रणायाम के अभ्यासी को घी-दूध सेवन अवश्य करना चाहिए।

  • बिना किसी योग्य शिक्षक या योगाचार्य के सिखाये, इसे न ही करें तो ही अच्छा है। योगाचार्य द्वारा भलीभांति सीखकर करने वाले साधक इससे लाभ उठा सकते हैं।

शीतली प्राणायाम (sheetali pranayam)

इस प्राणायाम में सुखासन से बैठकर, जीभ को कौए की चोंच के समान बनाकर (अर्थार्थ जीभ के किनारों को मोड़कर, नलकी-सी बनाकर), धीरे-धीरे प्राण वायु को खींचकर पूरक करते हैं। उदर को पूर्णरूप् से भरकर यथाशक्ति कुम्भक करते हैं। घबराहट होने पर दोनों नथुनों से रेचक करते हैं। बार-बार यही अभ्यास दोहराते हैं।

सावधानी

यह प्रणायाम कफ प्रकृति वाले न करें। अन्य लोग भी गर्मी की ऋतु में इसे न करें।

इससे अजीर्ण कफ-पित्त नाश, प्राण शान्त, प्यास शान्त, पित्त रोग दूर होते है। शरीर में शांति, सौंदर्य बढ़ता है। ‘ब्लड-प्रेशर हाई’ हो तो कम करता है।

कुछ प्राणायाम ऐसे भी है जो पुस्तकों में बहुत कम मिलते हैं किन्तु योगीजन उन्हें जानते है। ऐसे प्राणायाम उसी प्रकार चले जा रहे हैं जैसे वेद ज्ञान प्राचीनकाल में चलता था। मौखिक ज्ञान वेदों का ऋषि लोगों को होता था और वे अपने शिष्यों को कंठस्थ करा देते थे। ऐसे ही कुछ प्राणायाम भी हैं। ये प्राणायाम अत्यन्त सामर्थ्य प्रदाता हैं।

इनमें कुछ इस प्रकार हैं:

अग्नि प्रदीप्त प्राणायाम (agni-pradipt pranayam)

इसे करने के लिए पद्मासन में बैठते है। दाये नासिका छिद्र को बन्द करके बायें से धीरे-धीरे सांस को पूरक द्वारा मूलाधर तक इतना भर दें कि कण्ठ तक कहीं भी रिक्त स्थान न रहें। बलपूर्वक इतना कुम्भक करें कि छाती और मुंह लाल हो जायें। प्रथम बार में ही इतना अधिक न करें - धीरे-धीरे बढ़ा लें। जब घबराहट होने लगे तो दूसरे नथुने से धीरे-धीरे रेचक कर दें।

इसे दोनों नथुनों से भी कर सकते हैं परन्तु इसमें नये साधको को कठिनाई यह रहेगी कि दोनों से वायु शीघ्र आती जाती है। प्राणों पर संयम होने पर दोनों से किया जा सकता है।

अग्नि प्रदीप्त प्राणायाम के लाभ

  • इस प्राणायाम के अभ्यास से अत्यन्त सर्दी में भी पसीना आता है। शीत दूर करने के लिए ही योगी लोग पर्वतों में इसका अभ्यास करते हैं। स्वामी दयानन्द तथा अन्य अनेक ऋषियों ने इसका अभ्यास किया था।

  • इस प्राणायाम से पाचन अंग इतने शक्तिशाली हो जाते हैं कि अधिक भोजन को भी शीघ्र पचाते हैं।

  • मल-मूत्र, कफ घटता है, बल, तेज उत्साह, सौंदर्य और स्वर की मधुरता बढ़ती है। रोग नहीं रहते।

दीर्घ श्वांस-प्रश्वांस प्राणायाम (dheergh swans-praswans pranayam)

किसी भी अभ्यस्त आसन में बैठकर दोनों हथेलियों को घुटनों पर रख लें, दोनों नथुनों से वेगपूर्वक लम्बा करके पूरक करें। फिर बिना कुम्भक करे इसी प्रकार जोर से, लम्बा रेचक करें। कई बार इसी प्रकार जोर-जोर से लम्बे-लम्बे पूरक रेचक करें। संख्या पहले कम और फिर बढ़ाते जायें।

इससे फेफड़े स्वस्थ होते हैं, आमाशय आदि पाचक अंग स्वस्थ होते हैं। पाचन शक्ति और आयु में वृद्धि होती है तथा शक्ति और फुर्ती भी शरीर में आती है। इसे सब कर सकते हैं।

कुण्डलिनी जागरण में सहायक प्राणायाम (kundalini jagran mein sahayak pranayam)

ऐसे दो प्राणायाम निम्नलिखित हैं जो कि कुण्डलिनी जागरण में सहायक सिद्ध हो सकते हैं -

त्रिबंध रेचक प्राणायाम (tribandh rechak pranayam)

पहले किसी आसन में बैठकर दाईं ओर का नासपुट बन्द कर बायें से, नाभि से कण्ठ तक की सारी वायु निकाल दें। अब मूल बंध, उड्डियान बन्ध, जालन्धर बन्ध - ये तीनों ही बन्ध लगाकर हथेलियों का घुटनी पर रख लें, दृष्टि को नाक के अग्र भाग पर केन्द्रित कर लें। पेट पूरा पिचका रहता है।

यह प्राणायाम कुण्डलिनी शक्ति को शीघ्र जगा देता है, सुषुम्ना का बन्द द्वार खोल देता है।

सर्वद्वारबद्ध प्राणायाम (swadwarbandh pranayam)

पद्मासन पर सीधे बैठ जायें, दोनों नथुनों से मूलाधार से लेकर कण्ठ तक प्राण वायु भर लें और कुम्भक करके दोनों हाथों के अंगूठों से कान, तर्जनियों से आँखें, मध्यमाओं से नथुनों और छोटी अंगुलियोें से ओष्ठ बंद कर लें। ध्यान को भवों के मध्य जमायें। यथाशक्ति कुम्भक कर दोनों हाथों की अंगुलियाँ नथुनों से हटाकर रेचक करें। नित्यप्रति कुम्भक का समय बढ़ाते जायें।

इस प्राणायाम से भी दिव्य ज्योति प्रकट होती है। ध्यान में एकाग्रता आती है। ब्रह्मरंध्र प्रवेश का द्वार खुल जाता है।

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