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योग में षट्कर्म क्या होता है? (Yog mein Shatkarma kya hota hai?)

षट्कर्म - यह वो छः साधन हैं जो ‘हठयोग‘ के प्रथम अंग के रूप में स्वीकार किए जाते हैं| अतः हठयोग में रूचि रखने वाले जातकों को इनके विषय में भी विस्तार से जान लेना आवश्यक है, क्योंकि इनके बिना तो ‘हठयोग‘ की साधना संभव ही नहीं है।

(इस लेख में हम जानेंगे - What is Shatkarma in Yoga, in Hindi)

Table of Contents (in Hindi)
  • धौतिकर्म
  • वस्तिकर्म / एनिमा
  • नेतिकर्म
  • त्राटक
  • नौलिकर्म
  • कपालभाति
  • जलनेति
  • वारिसार धौति
  • शंखप्रक्षालन क्रिया

धौतिकर्म (Dhauti kriya)

कोमल (मुलायम) तथा बारीक मलमल वस्त्र में से चार अंगुल चौड़ी और लगभग सात मीटर लम्बी पट्टी बना लें। इसे सर्दियों में केवल गर्म जल या थोड़ा दूध और चीनी मिले जल में भिगों दें। अब उत्कष्ट आसन में (उकड़ू) बैठकर जल पात्र में भीगी वह पट्टी लें उसका एक सिरा मुख खोलकर कंठ में डालें और सीधे हाथ की मध्यमा और अनामिका अंगुलियों को मिलाकर इनके सहारे कंठ में धकेलें।

यह दूध मिला जल एक-दो घूंट पीकर धोति (पट्टी) को निगलने का यत्न करें। यदि उल्टी आ जाए तो दो एक मिनट ठहर कर गर्म जल के सहारे पूर्ववत् फिर निगलने का यत्न करें। किसी को दो-चार दिन में सफलता मिल जाती है, तो किसी को बहुत जल्दी। जल्दी न करें और न निराश हों। एक बार दो तीन फिट भी कंठ से नीचे उतर गयी तो फिर कोई कठिनाई नहीं आती।

सर्दियों में कुछ उष्ण जल धौति के साथ दो-दो घूंट के रूप में पीते रहने से धौति अन्दर जाते तथा बाहर आते समय कंठ में उलझती नहीं है। यदि कभी असावधानी से उलझ जाये तो गर्म जल से अन्दर कर लें या उल्टी करके बाहर निकाल दें। अभ्यास हो जाने पर फिर जल पीने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जब अभ्यास हो जाये तो धौति करके नौलि घुमाकर फिर धौति को बाहर निकाल दिया करें।

धौति के एक सिरे में लगभग एक हाथ छोड़कर गांठ लगा लें और यह सिरा बाहर रखें।

जब तक अभ्यास दृढ़ न हो तब तक कास्टर ऑइल, घी आदि का प्रयोग कर सकते हैं। इससे धौति सरलता पूर्वक अन्दर-बाहर चलायी जा सकती है। जब तक अभ्यास न हो जाये नित्य करें। फिर आवश्यकतानुसार कर लिया करें।

प्रयोग के बाद धौति को गर्म जल से कई बार साफ धोकर, सुखाकर, तह करके या पट्टी की भांति गोल लपेटकर रख दें।

‘हठयोग‘ साधक इसे नित्य करता रहे। अन्य लोग आवश्यकतानुसार या ऋतु परिवर्तन पर किया करें।

‘हठयोग प्रदीपिका‘ के अनुसार थौति क्रिया से खांसी, श्वांस, दमा, जिगर-तिल्ली रोग, कोढ़ तथा कफ सम्बन्धी रोग, जुकाम, पित्तरोग आदि से बचा जा सकता है, तथा ये रोग हैं तो वे नष्ट हो जाते हैं।

वस्तिकर्म / एनिमा (Vastikarm / Enema)

गुदा द्वार से जल खींचकर आंतो को नौलि के द्वारा धोकर इस जल को पुनः गुदा द्वार से निकाल देना वस्ति क्रिया है। ‘ऐनीमा‘ भी यही चीज है।

किसी बड़ी नांद या होदी में शुद्ध जल भरकर, इसमें उत्कृट आसन में (पंजों के बल) बैठें। किसी धातु चांदी, पीतल या लोहे की अथवा नरसल या लकड़ी की बनी इतनी मोटी नली जो गुदा में सरलता से आ जाये, लगाकर नौलि उठाकर आकुंचन करें। इससे जल आंतों में पहुँचने लगेगा।

नली चार-पांच इंच लम्बी और मोटाई में इतनी हो कि एक ओर सूराख में छोटी अंगुली तथा दूसरी ओर बीच वाली अंगुली जा सके। लगभग दो इंच छोड़कर बाकी नली गुदा में ऊपर न जा सके। पतला सिरा गुदा में चढ़ाकर गुदा से पकड़ कर वस्ति द्वारा जल खींचे। और आसानी के लिए, नली के मुख में आप तेल भी लगा सकते हैं|

जल उचित मात्रा में चढ़ाकर बाहर निकालें और नौलि को दाएं-बाएं घुमायें फिर बाईं ओर घुमाते हुए आंतों का जल गुदा द्वार से बाहर निकाल दें।

चेतावनी

यह क्रिया साफ स्वच्छ जल में करें। नदी या तालाब में करनी पड़े तो जल देख लें; वहाँ कीड़े या जोंक हो सकती हैं। अच्छा तो यही है कि टब में करें।

वस्ति क्रिया से वायु रोग, जलोदर, वातपित्त दोष, कफ सम्बन्धी रोग तथा धातु दोष दूर होते हैं। मन सयंमित होता है। सभी मल दूर होकर चित्त प्रसन्न होता है। प्रवृत्ति सात्विक होती है। कब्ज दूर, भूख वृद्धि और अपान शुद्धि होती है। शरीर वश में और सुन्दर बनता है।

नोट

आजकल प्लास्टिक के एनीमा यंत्र भी आते हैं, जिनकी नली भी प्लास्टिक की बनी होती है| आप उस एनिमा यन्त्र में पानी भरके ऊपर टांग दें और उसकी नली को अपने गुदाद्वार में डाल लें| ऐसा करने से पानी स्वतः ही गुरुत्वाकर्षण के कारण आँतों में पहुँचने लगेगा|

नेतिकर्म (Neti Karma)

एक हाथ लम्बा, सवा इंच चौड़ा मलमल का टुकड़ा लेकर चैड़ाई की ओर से फाड़ें और आधी लम्बाई तक फाड़कर इस फटे भाग को रस्सी के समान बना लें। अब किसी छोटी कटोरी में मधु के छत्ते से बना शुद्ध मोम डालकर पिघला लें। इसमें रस्सी जैसा बटा हुआ भाग डालकर भिगो लें, फिर इसे निकालकर अंगुलियों से मोम लगे भाग पर फेर कर सम कर लें। जिससे किसी भाग में मोम अधिक लगा रह कर कहीं से छील न दें। मोम लगे भाग की थोड़ी नोक सी बना लें, जिससे नाक में सरलता से नेति प्रविष्ठ हो सके।

इस नेति को पानी में (गिलास में) भिगोकर सामने रख लें। ध्यान रहे मोम वाला हिस्सा कहीं से मुड़कर टूट-सा न जाये। अब मोम वाले हिस्से को अंगुलियों में दबाकर, जिस ओर से सांस आ जा रही हो उस नथुने में शनैः-शनैः प्रविष्ट करें। छींक आने पर निकाल लें। दोबारा प्रविष्ट करायेें। इस प्रकार प्रथम बार में तीन-चार अंगुल प्रविष्ट करके छोड़ दें और शनैः-शनैः इसी प्रकार जब कंठ तक पहुँचने लगे तब दाएं हाथ की तर्जनी और बीच वाली अंगुलियाँ कंठ में डालकर कंठ में गयी नेति को इनसे पकड़कर मुख से बाहर निकालने का प्रयत्न करें। मुख से निकालते समय नासिका से बाहर निकले भाग को बाएँ हस्त के अंगूठे और अंगुलि से पकड़कर नाक के अन्दर धीरे-धीरे धकेलते जाएं। दाएं हाथ से मुख से बाहर निकालते रहें। इसी प्रकार दूसरे नथुने से भी अभ्यास करें।

इन क्रियाओं में शीघ्रता नहीं करनी चाहिए। जल्दी में कष्ट भी होता है और नाक में रगड़ भी लग सकती है।

अभ्यास खूब हो जाने पर नेति को बाहर भीतर खींच सकते हैं। कोमतलता से धीरे-धीरे चलाना चाहिए।

नेति क्रिया कपाल को शुद्ध करती है, नाक व कंठ के मल को निकालती है। जुकाम नहीं होने देती, नजले को कंठ में गिरने से रोकती है, सिर दर्द दूर करती है, दृष्टि को बढ़ाती है, मोतिया बिंद नहीं होता तथा कंधो से ऊपर के सब रोग दूर होते हैं।

त्राटक (Tratak)

किसी निश्चित स्थान या वस्तु पर नेत्र तथा ध्यान को स्थिर करने को त्राटक कहते हैं। ‘सिद्धासन‘ या अन्य किसी आसन में सुखपूर्वक बैठकर किसी वस्तु, चिह्न या दीपक पर दृष्टि जमा लें। दृष्टि और ध्यान एक साथ उसी वस्तु पर रहें। संकल्प-विकल्प न उठने दें।

इसके लिए आप एक कागज पर मटर के दाने के बराबर काला बिन्दु बनाकर लगभग दो-ढाई गज की दूरी पर दीवार पर टांगकर उस पर अपलक, ध्यान केन्द्रित कर सकते हैं। दीपक की लौ पर भी ध्यान और दृष्टि केन्द्रित कर सकते हैं।

जब आंखों में जलन होने लगे तो आंखे मूंद लें और शान्त बैठ जाएं।

त्राटक का समय बढ़ाते रहें। शक्ति के अनुसार कई घन्टे भी त्राटक को बढ़ाया जा सकता है।

इस क्रिया को करने से नेत्र रोग नष्ट होकर दृष्टि तीव्र होती है। इच्छा शक्ति बढ़ती है। नेत्रों की शक्ति इतनी बढ़ जाती है कि दिन में तारें भी देख सकते हैं। दूसरे लोग दृष्टि पात से ही आकर्षित हो जाते हैं। बाह्य धारणा और बाह्य ध्यान का बल बढ़ जाता है। मानसिक शक्ति भी बढ़ती है। ‘हठयोग‘ में त्राटक से ही शीघ्र सफलता मिलती है।

नौलिकर्म (Nauli kriya)

भूमि पर खड़े हो जाइए। पैरों में एक-डेढ़ फीट का अन्तर रहे। सामने कुछ झुककर, दोनों हथेलियाँ दोनों घुटनोें पर रख कर रेचक करके ‘उड्डियान’ करें।

मनोबल से तथा आभ्यान्तारिक कुशलता से अपान प्राण को धकेल-धकेल के उदार में नाभि के सामने अन्तड़ियों को खड़ी कर लें फिर खड़ी हुई अन्तड़ियों को एक पाश्र्व में घुमाने का यन्त करें। फिर इसी प्रकार दूसरे पाश्र्व में घुमायें। इस क्रिया को करते समय बाह्य कुम्भक अवश्य रखना चाहिए। इसके बिना नौलि को घुमाना कठिन है। नौलि बाह्य कुम्भक से उठाकर शीघ्र घुमाई जा सकती है।

मोटे व्यक्तियों के लिए यह कठिन है। वस्तिकर्म भी इस नौलि क्रिया के बिना सिद्ध नहीं होता है।

इस क्रिया से पाचन क्रिया तेज होती है, यह प्रसन्नता लाती है। चर्बी छटती है, कब्ज नहीं रहता, आंतों के विकार दूर होते हैं, पेट में दर्द नहीं होता, फुर्ती, शक्ति बढ़ती है, जिगर रोग नहीं होने पाते।

कपालभाति (Kapalbhati)

किसी आसन में बैठकर किसी एक नथुने से वायु अन्दर भरें और बिना कुम्भक किये दूसरी ओर से शीघ्रता से निकाल दें। लुहार की धोंकनी की भांति केवल रेचक-पूरक प्राणायाम करें।

जब एक नथुने से सांस लें तो दूसरा बन्द कर लें। अंगूठे का प्रयोग करें। अंगूठे से एक नथुना बंद करके दूसरे से श्वांस अन्दर खींचे और जब छोड़ें तब भी दूसरे को अंगूठे से बंद रखें। यही कपाल भाति है।

इससे नाड़ी शुद्धि होती है। शारीरिक और मानसिक शक्ति बढ़ती है। कफ विकार दूर होते हैं। कुंडलिनी जागरण में यह क्रिया सहायक है। ध्यान और धारणा में इससे बल मिलता है।

नोट

यह वास्तव में नाड़ी शुद्धि करने वाला पूरक-रेचक प्राणायाम ही है।

इन ‘षटकर्म‘ या ‘हठयोग‘ की छः क्रियाओं के अतिरिक्त योगाचार्यों ने कई अन्य उत्तम क्रियाएँ भी ‘हठयोग‘ में सहायक बतलायी हैं। जैसे - जलनेति, ब्रह्मदातन, गजकरणी, पवनवस्ति अग्निसार, वारिसार घौति, शंख प्रक्षालन क्रिया। इनमें जलनेति, और वारिसार घौति क्रिया विशेष उल्लेखनीय है। शंखप्रक्षालन क्रिया भी लाभप्रद है।

जलनेति (Jal Neti)

इसे करने के कई तरीके हैं:

  • टूंटी वाले लोटे या कमंडल में पानी लेकर नाक में डालना होता है और मुख से निकलना होता है। टूंटी या बर्तन का मुख नाक से लगाकर जल नाक में खींचते रहें मुख को खोल दें, जल निकलता रहेगा। नथुने बदलते रहें। अभ्यास हो जाने पर चुल्लू में लेकर भी नाक से जल खींच सकते हैं।

  • दूसरा तरीका यह है कि जल, दूध या घी को नाक से पीते जायें। मुंह बन्द रखें।

  • तीसरा तरीका यह है कि थोड़ा नमक मिला जल बर्तन में भर लें। मुख बन्द करके पात्र का मुख नाक के साथ लगाकर जल डालते जायें। मुँह एक दिशा में झुका लें। जल एक नथुने से दूसरे में निकलता जायेगा। जिस नथुने में कमंडल या लोटे की नली या टूंटी लगी है उसमें जल के साथ वायु न जानें दें। बिना नमक भी कर सकते हैं।

इससे सिर दर्द, जुकाम, नजला, कफ दोष दूर हो जाते हैं। कफ और पित्त के कारण बढ़ा हुआ छाती का दर्द भी जाता रहता है। आँखों के रोगों, मस्तक के रोग निवारणार्थ जलनेति अति उत्तम है।

जलनेति प्रातः निराहार ही करें। जैसी जरूरत हो जल गर्म या ठंडा ले सकते हैं।

वारिसार धौति (Varisara dhouti)

रबड़ की डेढ़ हाथ लम्बी और पौन इंच मोटी, पोली नलकी लें। उसे गर्म पानी में डुबोकर साफ़ कर लें। जब इस्तेमाल करना हो तो उसे ठंडी कर लें|

उस साफ-स्वच्छ नली को मुँह से कण्ठ में डालते जायें। प्रारम्भ में कठिनाई आयेगी। अभ्यास से ठीक हो जायेगा। नली पेट में जाने लगेगी। ऐसा होने लगे तब नाभि से पेट पिचका कर पानी उस नली में से निकाल दें। पेट का सारा पानी नली के द्वारा बाहर आ जायेगा।

उसके पश्चात् नलिका को फिर से साफ करके रख लें। यह क्रिया महीने में दो-तीन बार करते रहने से बहुत लाभ होता है।

कब्ज, अपच, पित्त, अम्ल, जुकाम, खांसी, सफेद कोढ़, स्नायु शूल आदि में लाभ होता है। यह क्रिया भोजन नली को साफ रखती है, पाचन क्रिया को दुरुस्त करती है और रोगाणुओं का नाश करके शरीर को स्वस्थ रखती है।

शंखप्रक्षालन क्रिया (Shankh Prakshalan Kriya)

प्रातःकाल चारपाई से उठकर, शौच से पूर्व मुँह-हाथ धो लें, और लगभग डेढ़ किलो जल गर्म करें। गर्म हो जाने पर पानी में दो तोले नमक मिला दें। इसके बाद दो नींबू काट कर उसमें निचोड़ लें और अच्छी तरह मिला लें। फिर गर्म-गर्म ही एक साथ सारा जल पी जायें। जल पी लेने के बाद, तुरन्त पांच आसन कर डालें, क्रमशः - पहले सर्पासन, दूसरा द्विपाश्र्वासन, तीसरा पवन मुक्तासन, चौथा विपरीताकरण आसन और पाँचवा हस्तपादासन। इन पाँचों को तीन-तीन बार करें।

जब मल का जोर होने लगे तो तुरन्त पखाना चले जायें। जब तक मल वेग से न आये आसन दोहराते रहें। प्रथम बार मल खुलकर आयेगा।

फिर शौच से निवृत्त होकर पुनः तीन पाव गर्म जल, जिसमें कुछ नमक हो, पी जायें। आसन दोहराते रहें। दो-तीन बार दोहराने से ही मलवेग पुनः आयेगा। अबकी बार पतला दस्त अर्थात् मल के साथ पानी आयेगा।

इसी प्रकार फिर शौच से निबट कर गर्म जल पी लें। आसन दोहरायें। इस प्रकार पाँच-छः बार दस्त हो जाने पर जब सफेद पानी ही पानी निकलने लगे तब समझो कि आँतें साफ हो गईं।

इसके बाद पेट साफ करने के लिए पानी पीकर वारिसार धौति या कुंजर क्रिया से पानी को निकाल दें। इस क्रिया से निवृत्त होकर आधे घण्टे के बाद शीतल जल से स्नान करें फिर डेढ़ घंटे बाद खिचड़ी या दलिया में थोड़ा घी मिलाकर खा लें।

आँतों में ही रोग के कीटाणु पनपते हैं। स्वास्थ्य चाहने वालों को पन्द्रह दिनों में यह क्रिया कर लेनी चाहिए। आँतों में गले सड़े मल विकार साफ शुद्ध हो जाते हैं। पेट के अनेक रोग दूर हो जाते हैं।

उपरोक्त सभी क्रियाएँ शरीर को निरोग और निर्मल करती हैं। शरीर प्राणायाम तथा आसन करने के योग्य होता है। योग की अन्य क्रियाएँ करने के लिए शरीर योग्य बनता है। और धारणा, ध्यान और समाधि में लाभ मिलता है।

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