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वात दोष के कारण, लक्षण और इलाज (vaat dosh ke karan, lakshan aur ilaj)

हमारा शरीर वात, कफ़ और पित्त की प्रवर्तियों से बना है| आमतौर पर इनमें संतुलन रहता है, पर जब इनमें असंतुलन होता है तो कई रोग हो सकते हैं|

इस लेख में हम वात और वात-दोष पर प्रकाश डालेंगे|

Table of Contents (in Hindi)
  • वात-दोष क्या होता है?
  • वात-दोष प्रकोपित क्यों होता है?
  • वात प्रकृति वाले व्यक्ति के लक्षण
  • वात का घरेलू इलाज
  • वात रोग में क्या खाएं

वात-दोष क्या होता है ? (vata dosh kya hota hai?)

आयुर्वेद में वात को प्राण कहा गया है| यह अत्यंत आवश्यक है| परन्तु इसके अनियंत्रित होने पर वात-दोष बनता है और यह स्तिथि कई बिमारियों को जन्म देती है, जैसे की गठिया, उच्च-रक्तचाप इत्यादि|

अर्थार्त, जब वात ज्यादा बढ़ जाता है तो उसे वात-दोष कहते हैं| इसे वात-दोष का प्रकोपित होना भी कहते हैं| यह अक्सर बुढ़ापे में ज्यादा देखने को मिलता है|

हमारे शरीर में पाँच तरह के वात बताये गए हैं:

  • उडान (udana) - यह कंठ से ऊपर के भाग में विचरण करता है|
  • प्राण (prana) - इसका स्थान हृदय में है|
  • समान (samana) - इसका स्थान नाभि में है|
  • अपान (apana) - इसका स्थान गुदाद्वार में है|
  • व्यान (vyana) - यह पूरे शरीर में विचरण करता है और शरीर की सारी क्रियाओं को संचालित और नियंत्रित करता है|

आप समझ सकते हैं की वात की हमारे शरीर में कितनी महत्त्वपूर्ण भूमिका है| इसी कारण वात-दोष होने पर 80 से ज्यादा रोग हो सकते हैं|

वात-दोष आपके शरीर में चिकनाई को कम कर देगा, या असंतुलित कर देगा| इसी वजह से सारी दिक्कतें होती हैं, जैसे की जोड़ों का दर्द भी जोड़ों में चिकनाई की कमी से ही होता है|

वात-दोष प्रकोपित क्यों होता है ? (vata dosh prakopit kyun hota hai?)

वात के प्रकोपित होने के कई कारण हो सकते हैं| परन्तु सबसे आम कारण है अपने शरीर की प्राकर्तिक क्रियाओं में हस्तक्षेप, जैसे कि:

  • छींक, मल, मूत्र को रोककर रखना|
  • पहले खाये खाने को पचने का मौका दिए बिना, फिर से कुछ खा लेना| बिना भूक लगे ना खाएं, अनियमित रूप से भोजन ग्रहण ना करें|
  • कम सोना या देर रात तक जागना| इससे भी शरीर की प्राकर्तिक क्रियाएँ बाधित हो जाती हैं और वात दोष को प्रकोपित कर देती हैं|
  • बहुत सूखा खाना, या ठंडा खाना भी वात को प्रकोपित कर सकता है, जैसे की फ़ास्ट फ़ूड, सूखे मेवे इत्यादि| अगर आपको मेवे खाने हैं तो उनको भीगाकर खाएं|
  • बहुत ठूँस -ठूँस कर खाने से भी यह हो सकता है| याद रखिये, आपको जितनी भूख हो, उससे थोड़ा कम ही खाएं| थोड़ा पेट खाली रहने दें|
  • बहुत परिश्रम करने से या मानसिक तनाव लेने से भी वात प्रकोपित हो सकता है| भविष्य को लेकर अत्यधिक डर पालने से भी यह हो सकता है|
  • संभोगिक क्रियाओं को हद से ज्यादा करने से भी यह दोष हो सकता है|
  • अनियमित रूप से उपवास करने से भी वात दोष हो सकता है|

वात प्रकृति वाले व्यक्ति के लक्षण (vata prakarti wale vyakti ke lakshan)

वात का मतलब गैस नहीं होता है| इसका मतलब होता है की किसी इंसान के शरीर व दिमाग में बहुत हलचल है|

  • अगर शरीर में हलचल ज्यादा है तो आप समझ सकते हैं की ऐसे मनुष्य का सबकुछ तेज होगा, उसके दिल की धड़कनें तेज होंगी, रक्तचाप बढ़ा हुआ होगा, लीवर और आँत का काम अस्त-व्यस्त होगा| इनको रोग भी जल्द ही पकड़ लेते हैं|

  • वात रोगी बहुत तेज-तेज और जल्दी-जल्दी साँसें लेते हैं| अगर कोई ऐसा मनुष्य आपके पास बैठा है, तो संभवतः आप उसके साँसों की आवाज़ भी आराम से सुन पाएंगे|

  • ऐसे लोग रुकना नहीं जानते| सबकुछ जल्दी-जल्दी करते हैं| तेज चलेंगे, तेज काम करेंगे, तेज खाना खाएंगे, निर्णय भी तेज लेंगे, बोलेंगे भी तेज| ये लोग सीखते भी जल्दी हैं और भूल भी जल्दी ही जाते हैं| उन्हें रुकना और आराम करना नहीं आता| अगर वो शारीरिक रूप से आराम कर भी रहे हैं, तो भी वो मानसिक रूप से बहुत कुछ सोच रहे होंगे| आप समझ सकते हैं की ऐसे लोगों के लिए ध्यान लगाना (मैडिटेशन करना) कितना आवश्यक होगा|

  • वात प्रकर्ति वालों को ठण्ड बहुत लगती है| ये लोग ठन्डे मौसम में या ठंडा खाने से बहुत जल्दी बीमार हो जाते हैं|

वात का घरेलू इलाज (vata ka gharelu ilaj)

वात दोष को ठीक/शांत करने के कई उपाय संभव हैं| हमको ऐसा उपाय चुनना चाहिए जो कारगर हो, उसका लाभ समग्र हो, स्थायी हो और जिसका प्रयोग करने में कोई हानि/दुष्प्रभाव न हो | धयान रखिये, हमें वात के गलत पहलुओं को हटाना है, वात की प्रकर्ति को नहीं| वात कोई गलत चीज़ नहीं होती है, पर किसी भी चीज़ की अति गलत होती है|

कौनसा उपाय आपको ज्यादा माफिक बैठेगा, यह इसपर भी निर्भर करता है कि:

  • आपके शरीर की प्रकर्ति कैसी है|
  • आपका वात दोष कितना बिगड़ा हुआ है - अगर आपका वात ज्यादा बिगड़ा हुआ है, तो आपके शरीर को किसी भी इलाज पर प्रतिक्रिया देने में ज्यादा समय लग सकता है|
  • आपके शरीर की स्तिथि कैसी है|

वात रोग की आयुर्वेदिक दवा (vata rog ki ayurvedic dava)

अष्टांग हृदय सूत्रस्थान में वाग्भाटा ऋषि ने बढ़े हुए वात दोष को शांत करने के कई उपाय सुझाये हैं| ये ग्रन्थ छटवीं शताब्दी के आसपास लिखा गया था| आइये जानते हैं की वो उपाय क्या हैं|

तेल का प्रयोग करें

तेल वात को शांत करता है| वात रोगियों को सूखापन बहुत रहता है| उनके जोड़ों का तरल कम हो जाता है, जिससे उन्हें जोड़ो का दर्द रहता है| उनकी त्वचा, बाल आदि सूखे रहते हैं| इसलिए तेल वात रोगियों को काफी फ़ायदा पहुंचाता है|

आयुर्वेद में तिल के तेल को सर्वश्रेष्ठ बताया गया है| यहाँ तक की तेल शब्द की उत्पत्ति भी तिल से ही हुई है| यह गर्म प्रकर्ति का होता है, जोकि वात रोगियों के लिए अच्छा है, क्यूंकि वात रोगियों को ठंड जल्दी लगती है| अतः, तिल के तेल की प्रकर्ति वात से विपरीत होती है| इसलिए यह वात में बहुत प्रभावी साबित होता है|

परन्तु यह जरुरी नहीं की तेल तिल का ही हो| उत्तर भारत में सरसों का तेल काफी प्रयोग में लाया जाता है, और दक्षिण भारत में नारियल का तेल| आपके यहाँ जो भी प्राकर्तिक तेल उपलब्ध हो, आप उसका प्रयोग कर सकते हैं|

तेल को फ्राई न करें| आप इसको सीधा रोटी में लगाकर, या दाल-सब्ज़ी में डालकर लें|

ध्यान दें!

वात रोगियों के शरीर में पहले ही चिकनाई की कमी होती है| अतः उन्हें तेल का अधिक प्रयोग करने से कोलेस्ट्रॉल आदि बढ़ने की सम्भावना कम ही होती है|

बस एक बात का धयान रखिये, कि वात रोगियों के पाचन की शक्ति ऊपर-नीचे होती रहती है| इसलिए अगर पेट भारी लगे, तो उस दिन तेल का सेवन न करें|

इसके अलावा, शरीर में रोज़ तेल मालिश करने से वात-दोष को काफी हद तक कम किया जा सकता है| मालिश के लिए आप तिल के तेल, सरसों के तेल, आदि के अलावा नारायण तेल, महानारायण तेल आदि भी प्रयोग कर सकते हैं|

अगर आप पूरे शरीर पर तेल नहीं लगाना चाहते, तो कम-से-कम हाथ-पैर में तेल जरूर लगाइये| आयुर्वेद के अनुसार इन तीन स्थानों पर तेल लगाने से सबसे अधिक फायदा होता है:

  • सिर पर तेल लगाना
  • कान में तेल डालना (लगाना नहीं, कान में तेल डालना)
  • पैर के तलुए पर तेल लगाना

इसके अलावा आप नाक में भी तेल डाल सकते हैं, या फिर छोटी ऊँगली को तेल में भीगाकर उससे अपने नथुनों के अंदर तेल लगाएं| इससे वात रोगियों के चिड़चिड़ेपन में भी कमी आती है|

बहुत ज्यादा तेल लगाने के बजाय, ये कोशिश करें की आपका शरीर उस तेल तो सोख ले| इसके लिए आप तेल लगाने के बाद शरीर के उस हिस्से की अच्छे से मालिश करें|

ध्यान दें!

वात दोष का निवारण करने के अलावा, रोज़ तेल-मालिश करने से बुढ़ापा भी देरी से आता है, और थकान भी दूर होती है|

थोड़ा सा पसीना बहाएं

वात के रोगियों को ऐसे कार्य करने चाहियें जिससे थोड़ा पसीना बहे, जैसे की सुबह धूप में बैठना, सिकाई करना आदि| पर पसीना बहाने का मतलब यहाँ बहुत मेहनत करना नहीं है|

वात-रोगी ज्यादा व्यायाम ना करें| वात रोगी को जिम या ज्यादा कड़े योगासन नहीं करने चाहियें| हलके-फुल्के आसन, प्राणायाम आदि आप कर सकते हैं|

इसके साथ ही, आपको ज्यादा भाग-दौड़ से बचना चाहिए| वात-रोगी जितना आराम करेंगे, उतना ही उनका वात-दोष कम होगा|

प्रभावित भाग को दबाना

वात के रोगियों को शरीर में जगह-जगह दर्द हो जाता है, जैसे जोड़ों आदि में| जहाँ आपको दर्द है, उस हिस्से को धीरे-धीरे दबाने से आराम मिलता है| आप चाहें तो खुद भी उस हिस्से को दबा सकते हैं|

आप उस हिस्से को पट्टी से बाँधकर भी रख सकते हैं| इससे भी लाभ होता है|

इसके अलावा आयुर्वेदिक चिकित्सक काढ़े, दवाई आदि का प्रयोग भी करते हैं| कुछ दवाइयों के प्रयोग से उलटी या दस्त करवाए जाते हैं, और वात दोष को बाहर निकाला जाता है| कुछ गर्म दवाइयाँ और तेल गुदाद्वार से भी डाले जाते हैं, जिनसे काफी तेज असर होता है| परन्तु ये सब किसी चिकित्सक द्वारा ही करवाना चाहिए, इसलिए हम इस लेख में इसका विस्तृत वर्णन नहीं दे पाएंगे|

वात रोगियों के लिए उपयुक्त प्राणायाम (vata rogiyon ke liye pranayam)

क्यूंकि वात-रोगी में हलचल ज्यादा होती है, इसलिए हमें ऐसे प्राणायाम करने चाहियें जो उनके शरीर और दिमाग को शांत करें| जैसे-जैसे आपका दिमाग और शरीर शांत होगा, आराम करना सीखेगा, वैसे ही वात दोष कम होना शुरू हो जायेगा|

अगर आप किसी वात दोष वाले मनुष्य को देखें, तो आप पाएंगे की वो हर काम तेज-तेज करते हैं, खाना जल्दी-जल्दी खाते हैं, साँसें भी तेज-तेज लेते हैं| हमें प्राणायाम में इसी तेजी की आदत को धीमा करना होता है|

  • कपालभाती प्राणायाम - वात-रोगी को यह प्राणायाम काफी फायदा पहुंचाता है, पर उन्हें इसको बहुत धीरे-धीरे करना चाहिए| अगर किसी वात-रोगी ने यह प्राणायाम बहुत तेज-तेज कर लिया तो लाभ की जगह हानी हो जाएगी; वात-दोष और भी बढ़ जायेगा, जैसे की आपको आँखों अथवा गुदा में जलन या दर्द होने लगेगा इत्यादि|

  • उज्जायी प्राणायाम - यह पाया गया है कि वात दोष वाले लोगों का मूड बहुत तेजी से बदलता है| इस प्राणायाम को करने से मूड में स्थिरता आती है|

वात रोग में क्या खाएं (vaat rog mein kya khayein?)

जहाँ तक खाने-पीने का प्रश्न है, तो ध्यान रखिये की वात रोगी को मीठा, खट्टा और नमकीन, तीनों तरह के खाने का सेवन करना चाहिए| यह इसलिए, क्यूंकि यह सब वात का दमन करते हैं|

  • गर्म खाने का सेवन करें| हो सके तो पानी भी थोड़ा गर्म ही लें, खासतौर से बरसात और ठण्ड के मौसम में|

  • सूखा खाना ना खाएं|

  • गुड़ का सेवन भी वात दोष को कम करता है|

इसके अलावा कोशिश करें की आपका खाना पौष्टिक हो, तथा ताज़ा हो|

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